हरियाणा के बारे में

About Haryana

हरियाणा का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में एक ऐसे प्रदेश की छवि उभर आती है जिसकी पुरातन धरोहर अत्यंत समृद्ध है और वर्तमान में भी जो देश के सर्वाधिक समृद्ध राज्यों में से एक है। वैदिक भूमि हरियाणा भारतीय सभ्यता का पालना रही है। भारतीय परम्पराओं में इस क्षेत्र को सृश्टि की आधात्री की मान्यता दी जाती है, जहां ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ करके सृष्टि का सृजन किया था। सृजन के इस सिद्धांत की पुष्टि पुरातत्वविद गाय ई.पिलग्रिम की पुरातात्विक खोज में भी होती है जिसके अनुसार डेढ़ करोड़ साल पहले मनुष्य हरियाणा की शिवालिक की पहाड़ियों में रहता था। वामनपुराण के अनुसार राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र की पावन भूमि में सात कोस क्षेत्र में भगवान शिव के वाहन नंदी को सोने के धार-फार से युक्त हल में जोतकर कृषि युग की शुरुआत की थी।

हरियाणा का गौरवपूर्ण अतीत अनेक मिथकों, किवदंतियों और वैदिक संदर्भों से भरा हुआ है। महर्षि वेदव्यास ने इसी पावन धरा पर महाभारत काव्य की रचना की। पांच हजार साल पहले यहीं पर महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का दिव्य संदेश देकर कर्तव्यबोध कराया था। उन्होंने कहा था कि ‘हे मनुष्य तू कर्म कर, फल की चिंता मत कर।’ तभी से कर्म का यह दर्शन मानवमात्र का प्रकाश स्तंभ की तरह हर समय मार्गदर्शन कर रहा है।

महाभारत काल से ही हरियाणा बहुधान्यक व बहुधना प्रदेश के रूप में विख्यात है। महाभारत के युद्ध से पहले भी कुरुक्षेत्र में दस राजाओं की लड़ाई हुई थी लेकिन महाभारत का युद्ध धर्म की स्थापना के लिए लड़ा गया था। इसमें भगवान श्री कृष्ण ने किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को गीता का पावन संदेश दिया था, जिससे कुरुक्षेत्र पूरे विश्व में विख्यात हो गया।

हरियाणा क्षेत्र अनेक युद्धों का साक्षी रहा है क्योंकि यह उत्तर भारत का प्रवेश द्वार है। हूणों, तुर्कों और तुगलकों ने अनेक बार भारत पर आक्रमण किया और हरियाणा की भूमि पर निर्णायक लड़ाइयां लड़ी गईं। 14वीं शताब्दी के अंत में तैमूरलंग ने इसी क्षेत्र से दिल्ली में प्रवेश किया था। 1526 में मुगलों ने पानीपत की ऐतिहासिक भूमि पर इब्राहिम लोधी को पराजित किया। पानीपत में ही 1556 में एक ओर निर्णायक युद्ध लड़ा गया, जिसने सदियों तक मुगलों को अपराजित शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। 18वीं शताब्दी के मध्य में मराठाओं ने हरियाणा पर अपना शासन स्थापित किया। भारत में अहमदशाह दुर्रानी के आक्रमण, मराठा शक्ति के उत्थान और मुगलों के पतन के बाद अंततः अंग्रेजी शासन का आगमन हुआ।

वास्तव में हरियाणा का इतिहास साहसी, धर्मनिश्ठ और गौरवशाली लोगों के संघर्ष की गाथा है। प्राचीनकाल से ही हरियाणा के बहादुर लोगों ने बड़े साहस के साथ विदेशी आक्रमणकारियों की सेनाओं का डटकर मुकाबला किया। इन तमाम झंझावातों का सामना करते हुए भी हरियाणा के लोग अपनी गरिमामयी परम्पराओं और इस पावन भूमि के गौरव को बनाए हुए हैं। 1857 में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यहां के वीरों ने शहादत, त्याग और वीरता का नया इतिहास रचा, जो इस कर्मभूमि की विषेशता को दर्शाता है। हरियाणा के वीरों ने सदैव ही राष्ट्रविरोधी शक्तियों का डटकर मुकाबला किया है।

हरियाणा का समाज सदैव विभिन्न जातियों, संस्कृतियों और धर्मों का मिश्रण रहा है। इस भूमि पर ये सब मिले, आपस में एक-दूसरे से जुड़े और एक सच्चे भारतीय बनकर निखरे। यहीं पर हिन्दू संतों और सिख गुरुओं ने विश्व प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया। महाकवि सूरदास का जन्म हरियाणा के जिला फरीदाबाद में स्थित गांव सीही में हुआ था, जो भारतीय संस्कृति का एक और केन्द्र है। भगवान श्री कृष्ण की कथा हरियाणा के हर आदमी की जुबान पर है। पशुओं के प्रति प्रेम और आहार में दूध की प्रचुरता के कारण इसे दूध-दही की नदियों वाले प्रदेश के रूप में विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिली।

भारतीय गणराज्य के एक अलग प्रदेश के रूप में हरियाणा की स्थापना 1 नवम्बर, 1966 को हुई। देश के भौगोलिक क्षेत्र का 1.37 प्रतिशत और जनसंख्या का दो प्रतिशत होने के बावजूद हरियाणा ने विभिन्न क्षेत्रों में शानदार उपलब्धियां प्राप्त की हैं जो अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय हैं। हरियाणा विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से विकास करते हुए अग्रणी राज्य बन गया है। हरियाणा आज दूध व खाद्यान्न उत्पादन में अव्वल है। यह आटोमोबाइल, आईटी और अन्य उद्योगों का बड़ा केन्द्र है। यहां अति उत्तम संचार सुविधाओं, विकसित औद्योगिक संपदाओं, चमचमाते चैड़े राजमार्गाें, एक्सप्रेस वे, रेलमार्ग, मैट्रो रेल का जाल बिछ चुका है। उन पर बने अनेक ओवर ब्रिज व फ्लाईओवर यातायात को सुगम बना रहे हैं। राज्य का हर गांव बिजली की रोशनी से जगमगा रहा है और आने-जाने के लिए सड़कों से जुड़ा है। यही नहीं पेयजल और सिंचाई के लिए पर्याप्त नहरें व अन्य साधन प्रदेश में उपलब्ध हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी यहां आधुनिक शिक्षा के हर संकाय और विषय की शिक्षा देने के लिए अनेक विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान खुल चुके हैं।

इतिहास

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हरियाणा की अलग प्रदेश के रूप में मांग को ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणावासियों की भागीदारी को देखते हुए अंग्रेज शासकों के मन में यहां के लोगों के प्रति बदले की भावना घर कर गई। इसलिए उन्होंने 1858 में राजनीतिक दण्ड के रूप में इस क्षेत्र को पंजाब में मिला दिया। राजनैतिक रूप से हरियाणा को अलग कर दिया गया लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से यहां के लोग दिल्ली व पश्चिमि उत्तरप्रदेश के लोगों के अधिक निकट थे। अतः उन्होंने राजनैतिक अलगाव के बावजूद दिल्ली व उत्तरप्रदेश के लोगों के साथ रोटी व बेटी का सांस्कृतिक सम्बंध बनाए रखा। अंग्रेजों की बदला लेने की नीति का यही परिणाम था कि इस क्षेत्र को विकास से वंचित रखा गया। यहां शिक्षा, व्यापार, उद्योग, संचार, सिंचाई आदि किसी भी क्षेत्र में विकास नहीं किया गया। इस कारण 19वीं सदी में यह क्षेत्र सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से पिछड़ा रह गया। 12 दिसम्बर, 1911 को भारत की राजधानी कलकता से बदलकर दिल्ली किये जाने के बाद हरियाणा को एक और अलगाव सहना पड़ा। वर्ष 1920 में जिला दिल्ली में कुछ बदलाव किये गये। उस समय मुस्लिम लीग ने भी दिल्ली की सीमाएं बढ़ाकर इसमें आगरा, मेरठ और अम्बाला मण्डल को शामिल करने का सुझाव दिया था। इसी तरह की एक मांग लोगों द्वारा दिल्ली के तत्कालीन आयुक्त श्री जे.पी. थामसन को की गई थी।

वर्ष 1928 में दिल्ली में सर्वदलीय बैठक हुई, जिसमें दिल्ली की सीमाओं का विस्तार करने की मांग पुनः उठी। हरियाणा के कुछ प्रमुख नेता, जिनमें पंडित नेकी राम शर्मा, लाला देशबंधु गुप्ता और श्रीराम शर्मा शामिल थे, महात्मा गांधी जी से मिले और उनसे अनुरोध किया कि हरियाणा क्षेत्र के जिलों को दिल्ली में मिला दिया जाए। वर्ष 1931 में दूसरी गोलमेज काॅन्फ्रेंस में पंजाब सरकार के तत्कालीन वित्तायुक्त और गोलमेज काॅन्फ्रेंस में भारतीय प्रतिनिधि मण्डल के सचिव श्री जियोफरी कारबर्ट ने सुझाव दिया कि पंजाब की सीमाओं का पुनर्गठन किया जाए और अम्बाला मण्डल को पंजाब से अलग किया जाए। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक दृष्टि से अम्बाला मण्डल हिन्दुस्तान का भाग था और पंजाब प्रांत में इसका मिलाया जाना अंग्रेजी शासन की एक घटना मात्र थी।

राज्य के नाम की उत्पत्ति

हरियाणा (हरयाणा) के नाम की उत्पत्ति के संबंध में बहुत सी व्याख्याएं हैं | हरियाणा एक प्राचीन नाम है | पुरातन काल में इस भू-भाग को ब्रह्मवर्त, आर्यवर्त और ब्रह्मोप्देष के नाम से जाना जाता था | ये नाम हरियाणा की इस धरा पर भगवान ब्रह्मा के अवतरण; आर्यों का निवास स्थान और वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर आधारित हैं। प्रो. एच. ए. फडके के अनुसार, विभिन्न धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के लोगों के संगम से समग्र भारतीय संस्कृति के निर्माण में हरियाणा का अपने तरीके से उल्लेखनीय योगदान रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क्षेत्र सृजन की भूमि है और इस धरा पर स्वर्ग के समान है। इसके अन्य नाम बहुधान्यक व हरियानक इस क्षेत्र में खाद्यान्नों और वनस्पति की प्रचुरता के परिचायक हैं।’ जिला रोहतक के बोहर गांव से मिले शिलालेख के अनुसार इस क्षेत्र को हरियानक के नाम से जाना जाता था। यह शिलालेख विक्रमी सम्वत् 1337 के दौरान बलबन काल से सम्बन्धित है। सुल्तान मोहम्मद-बिन-तुगलक के शासनकाल के एक पत्थर पर ‘हरियाणा’ शब्द अंकित है। धरणीधर ने अपनी रचना अखण्ड प्रकाश में लिखा है कि ‘यह शब्द ‘हरिबंका’ से लिया गया है, जो भगवान हरि की पूजा भगवान इंद्र से जुड़ा है। एक अन्य विचारक, गिरीश चंदर अवस्थी इसकी उत्पत्ति ऋग्वेद से मानते हैं, जिसमें हरियाणा नाम को राजा (वासुराजा) के नाम के साथ सार्वनामिक विशेषण के रूप में प्रयोग किया गया है। उनका मत है कि इस क्षेत्र पर उस राजा ने शासन किया था और इस तरह से इस क्षेत्र का नाम हरियाणा उनके नाम पर पड़ गया।

एक प्रशासनिक इकाई के रूप में राज्य का इतिहास

हरियाणा 12 वीं शताब्दी से पहले भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं जाना जाता था। यद्यपि हरियाणा शब्द की उत्पत्ति देर से हुई, फिर भी इस क्षेत्र की पुरातनता पर कभी सवाल नहीं उठाया गया है। तोमर राजपूतों ने दिल्ली से ‘हरियाणा’ पर शासन किया जब गजनवी ने उत्तर-पश्चिम से भारत पर आक्रमण किया। 1020 में लाहौर साम्राज्य गजनवी द्वारा कब्जा कर लिया गया था। सुल्तान महमूद के उत्तराधिकारी सुल्तान मसूद ने अपनी शक्ति का विस्तार करने के प्रयास में हांसी की ओर बढ़कर किले को घेर लिया। हांसी के पतन के बाद वह सोनीपत चला गया और उसके गवर्नर दीपाल हरि को हराया। जबकि दिल्ली के तोमर इन क्षेत्रों को वापिस लेने में सफल रहे, उन्होंने मुसलमानों को लाहौर के राज्य से हटाने का कोई प्रयास नहीं किया। हालांकि स्थिति गजनवी के पतन के साथ बदल गई, जब लाहौर का राज्य गौरी के हाथों में आ गया और दिल्ली के तोमर चह्वाण द्वारा हरा दिये गए। अजमेर के चह्वाण, 12वीं शताब्दी के मध्य तक तोमरों को हराने के बाद जल्द ही गौरी के साथ आमना-सामना करना पड़ा। 1186 शताब्दी में लाहौर लेने के बाद पृथ्वीराज के अधीन मुहम्मद गौरी को चह्वाण का सामना करना पड़ा। वह करनाल जिले में तारैन (तरावड़ी) में 1190-91 में अपनी पहली मुठभेड़ में पराजित हुआ और 1192 में पृथ्वीराज को हराने के लिए अगले वर्ष फिर वापस आया और सरस्वती नदी के नजदीक कैद किया गया या मारा गया। इस मुठभेड़ के दौरान उसने रोहतक जिले के महम नामक सबसे महत्वपूर्ण शहर को नष्ट कर दिया। वर्ष 1192 में तरावड़ी की लड़ाई के बाद, करनाल क्षेत्र दिल्ली से कुछ न कुछ मजबूती से जुड़ा हुआ था। 24 जून, 1206 को, कुतुब-उद-दीन एबक दिल्ली के सिंहासन पर बैठा और उत्तर भारत में मुस्लिम शासन आरम्भ किया। मध्य एशिया के तुर्क, एक कट्टरपंथी और आतंकवादी ढंग से इस्लाम धर्म को कबूल करवाने के लिए एक ऐसे देश के स्वामी बन गए, जिसमें लाखों लोग सामूहिक रूप से हिंदू धर्म में विश्वास करते थे। निरंतर दबाव और निर्दयी उत्पीड़न के बावजूद, लोगों के एक विशाल समूह ने विदेशी विजेता और उनके धर्म के लिए एक निर्विवाद प्रतिरोध पेश किया और उनके संपर्कों के बढ़ने पर भी अपनी विशिष्टता को बनाए रखने में एक दृढ़ता दिखाई।